26 जनवरी 2017 - 14:17
कौन झूठ बोल रहा है? ट्रंप या अमरीकन मीडिया।

कुछ लोग ट्रम्प के सोशल मीडिया द्वारा लोगों से सम्पर्क मे रहने को पारदर्शिता के लिये उठाया गया एक कदम मान रहे थे लेकिन ट्रम्प का अमेरिकी मीड़िया पर किया गया ट्वीट इस छवि को धूमिल कर रहा है।

कुछ लोग ट्रम्प के सोशल मीडिया द्वारा लोगों से सम्पर्क मे रहने को पारदर्शिता के लिये उठाया गया एक कदम मान रहे थे लेकिन ट्रम्प का अमेरिकी मीड़िया पर किया गया ट्वीट इस छवि को धूमिल कर रहा है।
खामोश रहो, बदतमीज़ी मत करो, तुम फ्राड़ न्यूज़ ऐजेंसी हो। बहुत कम राजनेता होंगे जो प्रेस कांफ्रेंस मे किसी न्यूज़ एजेंसी को इस तरह बोल सकें लेकिन ट्रम्प ने अपने पहले अधिकारिक भाषण और उससे कुछ दिन पूर्व भी सी एन एन पर जमकर भड़ास निकाली थी।
वह इससे पहले भी पत्रकारों के लिये इस तरह की बातें बोल चुके हैं जब उन्होने ट्रम्प टावर मे आयोजित प्रेस अधिकारियों की मीटिंग मे कहा था कि हम जिस हॉल मे बैठे हैं वह झूठे लोगों से भरा हुआ है। ट्रम्प का व्यकित्तव अचम्भित करने वाला है शायद उनके बर्ताव को लेकर कई कारण बयान किये जाएं लेकिन यह मानना पडेगा कि वह वर्तमान समय मे अमेरिकी समाज मे व्यवसथा को लेकर पाये जाने वाले रोष का प्रतिनिधित्व करते हैं और यह रोष सिर्फ अमेरिका मे ही नही आसपास के दूसरे देशों मे भी है यही कारण है कि लोग ट्रम्प की ऊट पटांग बातों को सुन भी रहें हैं और इसी आकर्षण ने ट्रम्प को व्हाइट हाउस तक पहुंचा दिया है।
१९७१ में यूनेस्को की बैठक में फ़िनलैंड के प्रधानमंत्री द्वारा फ्रेंकफोर्ट के विचारकों के अकेडमिक समीक्षा से लेकर एम्पायरलिस्म न्यूज़ तक मिडिया और टीवी चैनल पर टिप्पणी का इतिहास बहुत पुराना है। हालाँकि यह तमाम आलोचनाएं कट्टरपंथी द्रष्टिकोण रखती थी लेकिन उनका मिशन नए वैश्विक संस्कृति में मीडिया के वर्चस्व को विफल करना है। वह जन संस्कृति को लेकर चिन्तित थे जो नई टेक्निक और मिडिया के प्रभाव के कारण हर दिन बदल रही थी, यह मिडिया समूहों और उनके वर्चस्व के खिलाफ जान चेतना थी !
अब ट्रम्प जैसा आदमी मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ समाज का प्रतिनिधि हो जो सिर्फ व्यवस्था की आलोचनाओ कि लहर पर सवार रहा हो यह थोड़ा अजीब है।